कविताएँ Poems
सवैया
217अँखियाँ अँखियाँ सों सकाय
Raskhan
अंग ही अंग जराव
Raskhan
अंगनि अंग मिलाय दोऊ
Raskhan
अंजन मंजन* त्यागौ अली
Raskhan
अति लाल गुलालहु फूलत
Raskhan
अति लोक की लाज
Raskhan
अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार
Raskhan
अलबेली विलोकनि बोलनि औ
Raskhan
आई सबै व्रज-गोप लली
Raskhan
आज अचानक राधिका रूपनिधानि
Raskhan
आज गई व्रजराज के
Raskhan
आज भटू मुरली बरु
Raskhan
आज महूँ दधि बेचन
Raskhan
आजु गई हुती भोरही
Raskhan
आजु सँवारति नेक भटू*
Raskhan
आजु' सखी नँदनन्दन री
Raskhan
आयो हुतो नियरें रसखानि
Raskhan
आली पगे जु रँगे
Raskhan
आली लला घन सों
Raskhan
आवत लाल गुपाल लिए
Raskhan
आवत हैं बन तैं
Raskhan
इक ओर किरीट लसै*
Raskhan
उनहीं के सनेहन सानी
Raskhan
ए सजनी जब तैं
Raskhan
ए सजनी मनमोहन नागर
Raskhan
एक तैं एक लौं
Raskhan
एक समै इक लालनि
Raskhan
एक समैं जमुनाजल में
Raskhan
एक समै मुरली धुनि
Raskhan
एक सु तीरथ डोलत
Raskhan
औचक दृष्टि परै कहूँ
Raskhan
कंचन मन्दिर ऊँचे बनाइकै
Raskhan
कल कानन कुण्डल मोरपखा
Raskhan
कला निज कोटी ।
Raskhan
कंस कुढ्यौ सुनि बानी
Raskhan
कंस के क्रोध' की
Raskhan
काटे लटे की लटी
Raskhan
कातिक क्वार के प्रात
Raskhan
कान परे मृदु वैन
Raskhan
कान्ह भए बस बाँसुरी
Raskhan
काल्हि पर्यो मुरली धुनि
Raskhan
काल्हि भटू मुरली धुनि
Raskhan
काह कहूँ रतियाँ की
Raskhan
काहू कहूँ सजनी सँग
Raskhan
काहू को माखन चाखि
Raskhan
काहूसों माई कहा कहिए'
Raskhan
काहे कूँ जाति जसोमति
Raskhan
कीजै कहा जु पै
Raskhan
कुंजगली मैं अली निकसी
Raskhan
कुंजनि कुंजनि गुंज के
Raskhan
केसरिया पट, केसरि खौर*
Raskhan
कैसो मनोहर बानक मोहन
Raskhan
को रिझवारिन कों रसखानि
Raskhan
कोई है रास मैं
Raskhan
कौन की नागरि रूपकी
Raskhan
कौन को लाल सलोनो
Raskhan
कौन ठगौरी* भरी हरि
Raskhan
खंजन मीन सरोजन को
Raskhan
खेलत फाग सुहाग भरी
Raskhan
खेलिये फाग निसंक ह्वै
Raskhan
खेलै अलीजन* के गन
Raskhan
गावैं गुनी गनिका* गन्धर्ब*
Raskhan
गुंजरें सिर मोरपखा अरु
Raskhan
गोकुल के बिछुरे को
Raskhan
गोकुल नाथ बियोग प्रलै
Raskhan
ग्वालिन द्वै क भुआन
Raskhan
घर ही घर घेरु
Raskhan
चंद सों आनन मैन-मनोहर
Raskhan
चंदन खोर पै बिन्दु
Raskhan
छीर जो चाहत चीर
Raskhan
जग कान्ह भये बस
Raskhan
जमुना-तट वी गई जब
Raskhan
जा दिन तें मुसिकानि
Raskhan
जा दिन तैं निरख्यो
Raskhan
जाको लसै मुख चन्द
Raskhan
जात हुती* जमुना जल
Raskhan
जानत हौं न कछू
Raskhan
जानै कहा हम मूढ़
Raskhan
जाहु न कोऊ सखी
Raskhan
जो कवहूँ मग पाँव
Raskhan
जो रसना* रस ना
Raskhan
जोग सिखावत आवत है
Raskhan
डोरि लियौ मन मोरि
Raskhan
ता' जसुदा कह्यौ धेनु
Raskhan
तीरथ भीर में भूलि
Raskhan
तुम चाहो कहौ सो
Raskhan
तू मरवाइ* कहा झगरै
Raskhan
तेरी गली में जा
Raskhan
दमकैं रवि कुंडल दामिनी
Raskhan
दानी भए नए माँगत
Raskhan
दूर तें आइ दुरैहौं
Raskhan
दृग दूने खिंचे रहैं
Raskhan
देखत सेज विछी ही
Raskhan
देखन कौं सखी नैन
Raskhan
देखिकैं रास महावन को
Raskhan
देखिहौं आँखिन सों पिय
Raskhan
देस बिदेस के देखे
Raskhan
दोउ कानन कुण्डल मोरपखा
Raskhan
द्रौपदी औ गनिका गज
Raskhan
धूर भरे अति शोभित
Raskhan
नन्द को नन्दन है
Raskhan
नवरंग अनंग भरी छबि
Raskhan
नागर छैलहि गोकुल मैं
Raskhan
नैन मनोहर बैन बजै
Raskhan
नैननि बंकनि साल के
Raskhan
पहिले दधि लै गई
Raskhan
पिय सों तुम मान
Raskhan
प्यारी के चारु सिंगारु
Raskhan
प्यारी पै जाइ कितौ
Raskhan
प्रान वही जु रहैं
Raskhan
प्रेम कथानि की बात
Raskhan
प्रेम पगे जू रँगे
Raskhan
प्रेम मरोरि उठै तत्र
Raskhan
फागुन लाग्यो सखी जब
Raskhan
बंक बिलोकनि है दुखमोचन
Raskhan
बनें कान कुंडल मोरपखा
Raskhan
बंसी बजावत आनि कढ़ो
Raskhan
बाँकी धरें कलगी सिर
Raskhan
बाँकी बड़ी अँखियाँ बड़रारे'
Raskhan
बाँकी बिलोकनि रंग भरी
Raskhan
बाँकी मरोर गही भृकुटीन
Raskhan
बागन काहे को जाओ
Raskhan
बिहरें पिय प्यारी सनेह
Raskhan
बेनु बजावत गावन गावत
Raskhan
बैद की औषधि खाइ
Raskhan
बैन वही उनको गुन
Raskhan
बैरिन तो बरजी न
Raskhan
ब्रज की वनिता सव
Raskhan
ब्रह्मा मैं ढूँढ़्यो पुरानन
Raskhan
भई वावरी ढूँढ़ति वाहि
Raskhan
भटू सुन्दर स्याम सिरोमनि
Raskhan
भेती* जु पै कुवरी
Raskhan
भौंह भरी वरुनी सुथरी
Raskhan
मग हैरत धूँधरे नैन
Raskhan
मान की औधि है
Raskhan
मानुष हौं तो वही
Raskhan
मारग रोकि रह्यौ रसखानि
Raskhan
मेजं मनोहर मूरि लखै
Raskhan
मेरो सुभाव चितैवे कों
Raskhan
मैं रसखान की खेलनि
Raskhan
मैन मनोहर बैन बजै
Raskhan
मैन मनोहर बैन बड़े
Raskhan
मैन मनोहर री दुखदंदन
Raskhan
मो मन मोहन कों
Raskhan
मोतिन माल वनी लटकैं
Raskhan
मोर किरीट नवीन लसै
Raskhan
मोर के चंदन मौर
Raskhan
मोरपखा धरें चारिक चारु
Raskhan
मोरपखा मुरली बनमाल लख्यो'
Raskhan
मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं
Raskhan
मोरपखा सिर काननि कुंडल
Raskhan
मोहन के मन की
Raskhan
मोहन के मन भाइ
Raskhan
मोहन को मुरली सुनिकै
Raskhan
मोहन जू के वियोग
Raskhan
मोहन रूप छकी वन
Raskhan
मोहन सों अटक्यौ मनु
Raskhan
मोहिनी मोहन सों रसखानि
Raskhan
यह गोधन* गावत गोधन
Raskhan
यह देख धतूरे के
Raskhan
या' लकुटी अरु कामरिया
Raskhan
रसखानि यहै सुनि कै
Raskhan
रसखानि सुन्यो है वियोग
Raskhan
लंगर छैलहि गोकुल मैं
Raskhan
लाज के लेप चढ़ाइ
Raskhan
लाड़िली* लाल लसैं लखिये
Raskhan
लाय समाधि रहे वरम्हादिक
Raskhan
लाल की आज छठी
Raskhan
लाल लसै पगिया सबके
Raskhan
लीने अबीर भरे पिचका
Raskhan
लुगाई सबै व्रज माँहि
Raskhan
लोक की लाज तजी
Raskhan
लोग कहैं ब्रज के
Raskhan
वन वाग तड़ागनि कुंजगली
Raskhan
वह घंरनि धेनु अबेर
Raskhan
वह देखि धतूरे के
Raskhan
वह साँवरों नंद' को
Raskhan
वह सोई हुती परजंक
Raskhan
वा मुख की मुसकानि
Raskhan
वा रसखानि गुनों* सुनि
Raskhan
वागन में मुरली रसखान
Raskhan
वात चलै चमकै दुति
Raskhan
वात सुनी न कहूँ
Raskhan
वारति* जा पर ज्यों
Raskhan
वारहीं* गोरस बेंचि री
Raskhan
वृषभान के गेह दिवारी
Raskhan
शंकर से सुर जाहि
Raskhan
श्री वृषभान की छान*
Raskhan
श्रीमुख यों न बखान
Raskhan
सखि गोधन गावत हो
Raskhan
सखियाँ मनुहारि कै हारि
Raskhan
संपति सों सकुचाइ कुबेरहिं
Raskhan
सब धीरज क्यों न
Raskhan
साँझ समैं जिहि देखत
Raskhan
सार की सारी सो
Raskhan
सास की सासन* ही
Raskhan
सुधि होत बिदा नर
Raskhan
सुन री पिय मोहन
Raskhan
सुनिये सब को कहिये
Raskhan
सुन्दर स्याम सिरोमनि मोहन
Raskhan
सेस गनेस महेस दिनेस
Raskhan
सेस सुरेस* दिनेस* गनेस
Raskhan
सोई हुती पिय की
Raskhan
सोई हैं रास में
Raskhan
सोहत है चंदवा सिर
Raskhan
हैं छल की अप्रतीत
Raskhan
होती जु पै कुबरी
Raskhan
अवधेस के द्वारे सकारे गई।
Tulsidas
कबहूँ ससि मागत आरि करैं
Tulsidas
काय बचो मन ते बसी
Rasleen
तनकी दुति स्याम
Tulsidas
तनकी दुति स्याम
Tulsidas
पग नूपुर औ पहुँची
Tulsidas
पदकंजनि मंजु बनीं
Tulsidas
मानुस हौं तो वही रसखान
Raskhan
वर दंत की पंगति कुंदकली
Tulsidas
सरजू बर तीरहि तीर फिरैं
Tulsidas
दोहा
2कवित्त
11अन्त तें न आयो
Raskhan
अबहीं गई खिरक गाइ
Raskhan
आई खेलि होरी ब्रजगोरी
Raskhan
आपनो सो ढोंटा* हम
Raskhan
कंचन के मन्दिरनि दीठ
Raskhan
कहा रसखानि सुखसंपति सुमार
Raskhan
गोकुल को ग्वाल काल्हि
Raskhan
ग्वालन सँग जैबो बन
Raskhan
ब्याही अनब्याही ब्रजमाही सब
Raskhan
वेई ब्रम्हा ब्रम्हा जाहि
Raskhan
संभु धरै ध्यान जाको
Raskhan