कविताएँ Poems

सवैया

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अँखियाँ अँखियाँ सों सकाय

Raskhan

अंग ही अंग जराव

Raskhan

अंगनि अंग मिलाय दोऊ

Raskhan

अंजन मंजन* त्यागौ अली

Raskhan

अति लाल गुलालहु फूलत

Raskhan

अति लोक की लाज

Raskhan

अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार

Raskhan

अलबेली विलोकनि बोलनि औ

Raskhan

आई सबै व्रज-गोप लली

Raskhan

आज अचानक राधिका रूपनिधानि

Raskhan

आज गई व्रजराज के

Raskhan

आज भटू मुरली बरु

Raskhan

आज महूँ दधि बेचन

Raskhan

आजु गई हुती भोरही

Raskhan

आजु सँवारति नेक भटू*

Raskhan

आजु' सखी नँदनन्दन री

Raskhan

आयो हुतो नियरें रसखानि

Raskhan

आली पगे जु रँगे

Raskhan

आली लला घन सों

Raskhan

आवत लाल गुपाल लिए

Raskhan

आवत हैं बन तैं

Raskhan

इक ओर किरीट लसै*

Raskhan

उनहीं के सनेहन सानी

Raskhan

ए सजनी जब तैं

Raskhan

ए सजनी मनमोहन नागर

Raskhan

एक तैं एक लौं

Raskhan

एक समै इक लालनि

Raskhan

एक समैं जमुनाजल में

Raskhan

एक समै मुरली धुनि

Raskhan

एक सु तीरथ डोलत

Raskhan

औचक दृष्टि परै कहूँ

Raskhan

कंचन मन्दिर ऊँचे बनाइकै

Raskhan

कल कानन कुण्डल मोरपखा

Raskhan

कला निज कोटी ।

Raskhan

कंस कुढ्यौ सुनि बानी

Raskhan

कंस के क्रोध' की

Raskhan

काटे लटे की लटी

Raskhan

कातिक क्वार के प्रात

Raskhan

कान परे मृदु वैन

Raskhan

कान्ह भए बस बाँसुरी

Raskhan

काल्हि पर्यो मुरली धुनि

Raskhan

काल्हि भटू मुरली धुनि

Raskhan

काह कहूँ रतियाँ की

Raskhan

काहू कहूँ सजनी सँग

Raskhan

काहू को माखन चाखि

Raskhan

काहूसों माई कहा कहिए'

Raskhan

काहे कूँ जाति जसोमति

Raskhan

कीजै कहा जु पै

Raskhan

कुंजगली मैं अली निकसी

Raskhan

कुंजनि कुंजनि गुंज के

Raskhan

केसरिया पट, केसरि खौर*

Raskhan

कैसो मनोहर बानक मोहन

Raskhan

को रिझवारिन कों रसखानि

Raskhan

कोई है रास मैं

Raskhan

कौन की नागरि रूपकी

Raskhan

कौन को लाल सलोनो

Raskhan

कौन ठगौरी* भरी हरि

Raskhan

खंजन मीन सरोजन को

Raskhan

खेलत फाग सुहाग भरी

Raskhan

खेलिये फाग निसंक ह्वै

Raskhan

खेलै अलीजन* के गन

Raskhan

गावैं गुनी गनिका* गन्धर्ब*

Raskhan

गुंजरें सिर मोरपखा अरु

Raskhan

गोकुल के बिछुरे को

Raskhan

गोकुल नाथ बियोग प्रलै

Raskhan

ग्वालिन द्वै क भुआन

Raskhan

घर ही घर घेरु

Raskhan

चंद सों आनन मैन-मनोहर

Raskhan

चंदन खोर पै बिन्दु

Raskhan

छीर जो चाहत चीर

Raskhan

जग कान्ह भये बस

Raskhan

जमुना-तट वी गई जब

Raskhan

जा दिन तें मुसिकानि

Raskhan

जा दिन तैं निरख्यो

Raskhan

जाको लसै मुख चन्द

Raskhan

जात हुती* जमुना जल

Raskhan

जानत हौं न कछू

Raskhan

जानै कहा हम मूढ़

Raskhan

जाहु न कोऊ सखी

Raskhan

जो कवहूँ मग पाँव

Raskhan

जो रसना* रस ना

Raskhan

जोग सिखावत आवत है

Raskhan

डोरि लियौ मन मोरि

Raskhan

ता' जसुदा कह्यौ धेनु

Raskhan

तीरथ भीर में भूलि

Raskhan

तुम चाहो कहौ सो

Raskhan

तू मरवाइ* कहा झगरै

Raskhan

तेरी गली में जा

Raskhan

दमकैं रवि कुंडल दामिनी

Raskhan

दानी भए नए माँगत

Raskhan

दूर तें आइ दुरैहौं

Raskhan

दृग दूने खिंचे रहैं

Raskhan

देखत सेज विछी ही

Raskhan

देखन कौं सखी नैन

Raskhan

देखिकैं रास महावन को

Raskhan

देखिहौं आँखिन सों पिय

Raskhan

देस बिदेस के देखे

Raskhan

दोउ कानन कुण्डल मोरपखा

Raskhan

द्रौपदी औ गनिका गज

Raskhan

धूर भरे अति शोभित

Raskhan

नन्द को नन्दन है

Raskhan

नवरंग अनंग भरी छबि

Raskhan

नागर छैलहि गोकुल मैं

Raskhan

नैन मनोहर बैन बजै

Raskhan

नैननि बंकनि साल के

Raskhan

पहिले दधि लै गई

Raskhan

पिय सों तुम मान

Raskhan

प्यारी के चारु सिंगारु

Raskhan

प्यारी पै जाइ कितौ

Raskhan

प्रान वही जु रहैं

Raskhan

प्रेम कथानि की बात

Raskhan

प्रेम पगे जू रँगे

Raskhan

प्रेम मरोरि उठै तत्र

Raskhan

फागुन लाग्यो सखी जब

Raskhan

बंक बिलोकनि है दुखमोचन

Raskhan

बनें कान कुंडल मोरपखा

Raskhan

बंसी बजावत आनि कढ़ो

Raskhan

बाँकी धरें कलगी सिर

Raskhan

बाँकी बड़ी अँखियाँ बड़रारे'

Raskhan

बाँकी बिलोकनि रंग भरी

Raskhan

बाँकी मरोर गही भृकुटीन

Raskhan

बागन काहे को जाओ

Raskhan

बिहरें पिय प्यारी सनेह

Raskhan

बेनु बजावत गावन गावत

Raskhan

बैद की औषधि खाइ

Raskhan

बैन वही उनको गुन

Raskhan

बैरिन तो बरजी न

Raskhan

ब्रज की वनिता सव

Raskhan

ब्रह्मा मैं ढूँढ़्यो पुरानन

Raskhan

भई वावरी ढूँढ़ति वाहि

Raskhan

भटू सुन्दर स्याम सिरोमनि

Raskhan

भेती* जु पै कुवरी

Raskhan

भौंह भरी वरुनी सुथरी

Raskhan

मग हैरत धूँधरे नैन

Raskhan

मान की औधि है

Raskhan

मानुष हौं तो वही

Raskhan

मारग रोकि रह्यौ रसखानि

Raskhan

मेजं मनोहर मूरि लखै

Raskhan

मेरो सुभाव चितैवे कों

Raskhan

मैं रसखान की खेलनि

Raskhan

मैन मनोहर बैन बजै

Raskhan

मैन मनोहर बैन बड़े

Raskhan

मैन मनोहर री दुखदंदन

Raskhan

मो मन मोहन कों

Raskhan

मोतिन माल वनी लटकैं

Raskhan

मोर किरीट नवीन लसै

Raskhan

मोर के चंदन मौर

Raskhan

मोरपखा धरें चारिक चारु

Raskhan

मोरपखा मुरली बनमाल लख्यो'

Raskhan

मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं

Raskhan

मोरपखा सिर काननि कुंडल

Raskhan

मोहन के मन की

Raskhan

मोहन के मन भाइ

Raskhan

मोहन को मुरली सुनिकै

Raskhan

मोहन जू के वियोग

Raskhan

मोहन रूप छकी वन

Raskhan

मोहन सों अटक्यौ मनु

Raskhan

मोहिनी मोहन सों रसखानि

Raskhan

यह गोधन* गावत गोधन

Raskhan

यह देख धतूरे के

Raskhan

या' लकुटी अरु कामरिया

Raskhan

रसखानि यहै सुनि कै

Raskhan

रसखानि सुन्यो है वियोग

Raskhan

लंगर छैलहि गोकुल मैं

Raskhan

लाज के लेप चढ़ाइ

Raskhan

लाड़िली* लाल लसैं लखिये

Raskhan

लाय समाधि रहे वरम्हादिक

Raskhan

लाल की आज छठी

Raskhan

लाल लसै पगिया सबके

Raskhan

लीने अबीर भरे पिचका

Raskhan

लुगाई सबै व्रज माँहि

Raskhan

लोक की लाज तजी

Raskhan

लोग कहैं ब्रज के

Raskhan

वन वाग तड़ागनि कुंजगली

Raskhan

वह घंरनि धेनु अबेर

Raskhan

वह देखि धतूरे के

Raskhan

वह साँवरों नंद' को

Raskhan

वह सोई हुती परजंक

Raskhan

वा मुख की मुसकानि

Raskhan

वा रसखानि गुनों* सुनि

Raskhan

वागन में मुरली रसखान

Raskhan

वात चलै चमकै दुति

Raskhan

वात सुनी न कहूँ

Raskhan

वारति* जा पर ज्यों

Raskhan

वारहीं* गोरस बेंचि री

Raskhan

वृषभान के गेह दिवारी

Raskhan

शंकर से सुर जाहि

Raskhan

श्री वृषभान की छान*

Raskhan

श्रीमुख यों न बखान

Raskhan

सखि गोधन गावत हो

Raskhan

सखियाँ मनुहारि कै हारि

Raskhan

संपति सों सकुचाइ कुबेरहिं

Raskhan

सब धीरज क्यों न

Raskhan

साँझ समैं जिहि देखत

Raskhan

सार की सारी सो

Raskhan

सास की सासन* ही

Raskhan

सुधि होत बिदा नर

Raskhan

सुन री पिय मोहन

Raskhan

सुनिये सब को कहिये

Raskhan

सुन्दर स्याम सिरोमनि मोहन

Raskhan

सेस गनेस महेस दिनेस

Raskhan

सेस सुरेस* दिनेस* गनेस

Raskhan

सोई हुती पिय की

Raskhan

सोई हैं रास में

Raskhan

सोहत है चंदवा सिर

Raskhan

हैं छल की अप्रतीत

Raskhan

होती जु पै कुबरी

Raskhan

अवधेस के द्वारे सकारे गई।

Tulsidas

🎵

कबहूँ ससि मागत आरि करैं

Tulsidas

🎵

काय बचो मन ते बसी

Rasleen

तनकी दुति स्याम

Tulsidas

तनकी दुति स्याम

Tulsidas

पग नूपुर औ पहुँची

Tulsidas

पदकंजनि मंजु बनीं

Tulsidas

Ram

मानुस हौं तो वही रसखान

Raskhan

Krishna

वर दंत की पंगति कुंदकली

Tulsidas

सरजू बर तीरहि तीर फिरैं

Tulsidas

दोहा

2

कवित्त

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