अंगनि अंग मिलाय दोऊ
अंगनि अंग मिलाय दोऊ रसखानि रहे लपटे तरु छाँहीं ।
संग निसंग अनंग* को रंग सुरंग सनी पिय दै गल बाँहीं ॥
बैन ज्यों मैन सु ऐन* सनेह कों लूटि रहे रति अन्तर जाहीं ।
नीबी* गहै कुच कंचन कुंभ कहै बनिता पिय नाहीं जू ना नाहीं ॥१७॥
अंगनि अंग मिलाय दोऊ रसखानि रहे लपटे तरु छाँहीं ।
संग निसंग अनंग* को रंग सुरंग सनी पिय दै गल बाँहीं ॥
बैन ज्यों मैन सु ऐन* सनेह कों लूटि रहे रति अन्तर जाहीं ।
नीबी* गहै कुच कंचन कुंभ कहै बनिता पिय नाहीं जू ना नाहीं ॥१७॥