अंग ही अंग जराव
अंग ही अंग जराव जरी* अरु सीस बनी पगिया* जरतारी* ।
मोतिनि माल हिये लटकै लटुआ* लटकै सब घूंघरवारी ॥
पूरन पुन्य हुँ तैं रसखानि ये मोहनी मूरति आनि निहारी ।
चारों दिसा के महा अघ हाँके जो झाँके झरोखे में वाँके विहारी ॥१३७॥
अंग ही अंग जराव जरी* अरु सीस बनी पगिया* जरतारी* ।
मोतिनि माल हिये लटकै लटुआ* लटकै सब घूंघरवारी ॥
पूरन पुन्य हुँ तैं रसखानि ये मोहनी मूरति आनि निहारी ।
चारों दिसा के महा अघ हाँके जो झाँके झरोखे में वाँके विहारी ॥१३७॥