अंजन मंजन* त्यागौ अली

Raskhan

अंजन मंजन* त्यागौ अली अँग धारि भभूत करौ अनुरागै ।
आपुन भाग कर्यौ सजनी इन वावरे ऊधो जू को कहाँ लागै ।
चाहै सो और सबै करियै जु कहै रसखान सयानप आगै ।
जो मन मोहन ऐसी बसी तो सबै री कहीं मुख गोरस जागै ॥२३५॥