अति लोक की लाज

Raskhan

अति लोक की लाज समूह मै घेरिकै राखि थकी भव संकट सों ।
पल मैं कुलकानि की मेड़नकी नहि रोकी रुकी पल के पट सों ॥
रसखानि सों केतो उचाटि रही उचटी न संकोच की औचट सों ।
अलि कोटि कियो हटकी न रही अँटकी अँखिया लटकी लट सों ॥३५॥