अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार

Raskhan

अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है ।
लखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गाँठन खोलत है’ ।
सुनि री सजनी अलवेलो लला वह कुंजनि कुंजनि डोलत है ।
रसखानि लखें मन बूड़ि गयौ मधि रूप के सिंधु कलोलत है ॥१६१॥