अन्त तें न आयो

Raskhan

अन्त तें न आयो याही गाँवरे को जायो,
माई बावरे जिवायो प्याइ दूध बारे बारे को ।
सोई रसखानि पहिचानि कानि छाड़ि चाहै,
लोचन नचावत नचैया द्वारे द्वारे को ।
भैया की तौ सोच कछू मटकी उतारे को न,
गोरस के ढारे को न चीर चीर डारे को ।
यहै दुख भारी गहै डगर हमारी माझ,
नगर हमारे ग्वाल बगर हमारे को ॥१०८॥