अबहीं गई खिरक गाइ
अबहीं गई खिरक गाइ के दुहाइबे कों
बावरी ह्वै आई डारि दोहनी यों पानिकी ।
कोऊ कहै छरी कोऊ भौन परी डरी कोऊ
कोऊ कहै मरी गति हरी अँखियान की ।
सास व्रत ठानै नंद बोलत सयाने धाइ
दौरि दौरि जानै मानो खोरि देवतनि की ।
सखी सब हाँसैं मुरझानि पहिचानि कहूँ,
देखी मुसकानि वा अहीर रसखानि की ॥७३॥