अलबेली विलोकनि बोलनि औ
अलबेली विलोकनि बोलनि औ अलवेलियै लोल निहारन की ।
अलबेली सी डोलनि गंडनि पै छवि सों मिली कुंडल वारन की ।
भटू ठाढ़ौ लख्यौ छवि कैसें कहौं रसखानि गहैं द्रुम डारन की ।
हिय मैं जिय मैं मुसकानि रसी गति को सिखवै निरवारन की ॥१६२॥
अलबेली विलोकनि बोलनि औ अलवेलियै लोल निहारन की ।
अलबेली सी डोलनि गंडनि पै छवि सों मिली कुंडल वारन की ।
भटू ठाढ़ौ लख्यौ छवि कैसें कहौं रसखानि गहैं द्रुम डारन की ।
हिय मैं जिय मैं मुसकानि रसी गति को सिखवै निरवारन की ॥१६२॥