आजु गई हुती भोरही

Raskhan

आजु गई हुती भोरही हौं रसखानि रई* कहि नन्द के भौंनहिं ।
वाको जियो जुग लाख करोर जसोमति को सुख जात कह्यो नहिं ॥
तेल लगाइ लगाइ कै अंजन भौंह बनाइ बनाइ डिठौनहिं ।
डालि हमेलनि हार निहारत वारत ज्यों चुचकारत छौनहिं* ॥१०॥