आजु' सखी नँदनन्दन री
आजु’ सखी नँदनन्दन री तकि ठाढ़ो है कुंजनि की परछाहीं ।
नैन बिसाल की जोहन को सर बेधि गयो हियरा जिय माहीं ॥
घाइल घूमि खुमार गिरी रसखानि सँम्हारत अंगन नाहीं ।
तापर वा मुसिकानि की डौंड़ी बजी ब्रज मैं अबला कित जाहीं ॥३६॥
आजु’ सखी नँदनन्दन री तकि ठाढ़ो है कुंजनि की परछाहीं ।
नैन बिसाल की जोहन को सर बेधि गयो हियरा जिय माहीं ॥
घाइल घूमि खुमार गिरी रसखानि सँम्हारत अंगन नाहीं ।
तापर वा मुसिकानि की डौंड़ी बजी ब्रज मैं अबला कित जाहीं ॥३६॥