आज भटू मुरली बरु
आज भटू मुरली बरु के तर’ नन्द के साँवरे रासु रच्यो री ।
नैननि सैननि* वैननि मैं नहि कोऊ मनोहर भाव बच्यो री ॥
जद्यपि राखन कों कुलकानि सबै ब्रजबालन प्रान तच्यो री ।
तद्यपि वा रसखान के हाथ बिकान को अन्त लच्यो पै लच्यो री ॥८६॥
आज भटू मुरली बरु के तर’ नन्द के साँवरे रासु रच्यो री ।
नैननि सैननि* वैननि मैं नहि कोऊ मनोहर भाव बच्यो री ॥
जद्यपि राखन कों कुलकानि सबै ब्रजबालन प्रान तच्यो री ।
तद्यपि वा रसखान के हाथ बिकान को अन्त लच्यो पै लच्यो री ॥८६॥