आज महूँ दधि बेचन
आज महूँ दधि बेचन जात ही मोहन रोकि लियो मग आयो ।
माँगत दान में आनि लियो सु कियो निलजी रसजोवन खायो ॥
काह कहूँ सिगरी री बिथा* रसखानि लियो हँसि के मुसिकायो ।
पाले परी मैं अकेली लली लला लाज लियो सुकियो मन भायो ॥९१॥
आज महूँ दधि बेचन जात ही मोहन रोकि लियो मग आयो ।
माँगत दान में आनि लियो सु कियो निलजी रसजोवन खायो ॥
काह कहूँ सिगरी री बिथा* रसखानि लियो हँसि के मुसिकायो ।
पाले परी मैं अकेली लली लला लाज लियो सुकियो मन भायो ॥९१॥