आली पगे जु रँगे

Raskhan

आली पगे जु रँगे रँग संवल सोहैं न’ आवत लालची नैना ।
धावत हैं उतही जित मोहन रोके रुकें नहिं घूंघट ऐना ॥
कानन कौं कल नाहिं परै सखी प्रेम सों भीजे सुनै बिन बैना ।
भई मधु की मखियाँ रसखानि’ जू नेह को बंधन क्यों हूँ छुटै ना ॥७७॥