एक तैं एक लौं

Raskhan

एक तैं एक लौं काननि मै रहै ढीठ सखा सब लीने कन्हाई ।
आवतही हौं कहाँ लों कहों कोउ कैसें सहै अति की अधिकाई ॥
खायो दही मेरो भाजन* फोरयो न छोड़त चीर दिवावै दुहाई ।
रसखानि तिहारी सौं* एरी जसोमति भागे मरू करि छूटन पाई ॥१२॥