एक समैं जमुनाजल में
एक समैं जमुनाजल में सब मज्जन हेत नसीं ब्रज गोरी ।
त्यों रसखान गयो मनमोहन लै कर चीर कदम्ब की वारी ॥
न्हाइ जबै निकसीं वनिता चहुँ ओर चितै चित रोस कर्योरी ।
हार हियो भरि भावन सो पट दीने लला वचनामृत वारी ॥१४४॥
एक समैं जमुनाजल में सब मज्जन हेत नसीं ब्रज गोरी ।
त्यों रसखान गयो मनमोहन लै कर चीर कदम्ब की वारी ॥
न्हाइ जबै निकसीं वनिता चहुँ ओर चितै चित रोस कर्योरी ।
हार हियो भरि भावन सो पट दीने लला वचनामृत वारी ॥१४४॥