एक समै इक लालनि

Raskhan

एक समै इक लालनि कों ब्रजजीवन खेलत दृष्टि पर्यौ है ।
बालप्रबीन सकै करिकै सरकाइ कै मोर न चीर धर्यौ है ॥
यों रसही रसखानि सखी, अपनो मनभायो कर्यो है ।
नन्द के लाड़िले ढाँकि दै सोस हहा हमरो बर हाथ भर्यौ है ॥११८॥