एक समै मुरली धुनि
एक समै मुरली धुनि मैं रसखानि लियो कहुं नाम हमारौ ।
ता दिन तैं परि बैरी बिसासिनी झाँकन देती नहीं है दुवारो ॥
होत चवाव बचाओं सु क्यों करि क्यों अलि भेंटिए प्रान पियारो ।
दृष्टि परी तबहीं चटको अटको हियरे पियरे पटवारो ॥४॥
एक समै मुरली धुनि मैं रसखानि लियो कहुं नाम हमारौ ।
ता दिन तैं परि बैरी बिसासिनी झाँकन देती नहीं है दुवारो ॥
होत चवाव बचाओं सु क्यों करि क्यों अलि भेंटिए प्रान पियारो ।
दृष्टि परी तबहीं चटको अटको हियरे पियरे पटवारो ॥४॥