ए सजनी जब तैं

Raskhan

ए सजनी जब तैं मैं सुनी मथुरा नगरी बरषा रितु आई ।
लै रसखान सनेह की ताननि* कोकिल मोर मलार मचाई ।
साँझ ते भोर लौं भोर तैं साँझ लौं गोपिन चातक ज्यों रट लाई ।
एरी सखी कहिये तो कहाँ लगि बैरी अहीर ने पीर न पाई ॥२३०॥