ए सजनी मनमोहन नागर

Raskhan

ए सजनी मनमोहन नागर आगर दौर करी मन माहीं ।
सास के त्रास उसास न आवत कैसे सखी व्रजवास बसाहीं ।
माखी भई मधु की तरुनी वरुनीन के बान बिंधी कित जाहीं ।
वीथिन डोलति हैं रसखानि रहें निज मन्दिर में पल नाहीं ॥१७१॥