औचक दृष्टि परै कहूँ

Raskhan

औचक दृष्टि परै कहूँ कान्ह जू तासों कहै ननदी अनुरागी ।
सो सुनि सास रही मुख मोरि जिठानी फिरै जिय में रिस पागी ॥
नीके निहारि कै देखे न आँखिन हौं कबहूँ भरि नैन न जागी ।
मो पछितावो यहै जू सखी कि कलंक लग्यो पर अंक न लागी ॥८१॥