कंचन के मन्दिरनि दीठ
कंचन के मन्दिरनि दीठ ठहरात नाहिं
सदा दीपमाल लाल मानिक उजारे सों ।
और प्रभुताई अब कहाँ लौं बखानौं प्रति
हारन की भीर भूप टरत न द्वारे सों ।
गंगाजी में न्हाइ मुक्ताहलहू लुटाइ बेद
बीस बार गाइ ध्यान कीजत सकारे सों ।
ऐसे ही भए तो नर कहा रसखानि जो पै
चित दै न कीनी प्रीत पीतपटवारे सों ॥१०५॥