कंस के क्रोध' की
कंस के क्रोध’ की फैल गई जबहीं ब्रजमण्डल बीच पुकार सी ।
आइ गए’ तबही कछनी कसकैं नटनागर नन्दकुमार सी ॥
द्वै रद को रद ऐंचि’ लियो रसखानि इहै मन आइ विचार सी’ ।
लागी कुठौर लई लखि’ कलंक तमाल तें कीरति डार सी ॥११०॥
कंस के क्रोध’ की फैल गई जबहीं ब्रजमण्डल बीच पुकार सी ।
आइ गए’ तबही कछनी कसकैं नटनागर नन्दकुमार सी ॥
द्वै रद को रद ऐंचि’ लियो रसखानि इहै मन आइ विचार सी’ ।
लागी कुठौर लई लखि’ कलंक तमाल तें कीरति डार सी ॥११०॥