काटे लटे की लटी

Raskhan

काटे लटे की लटी लकुटी दुपटी सुफटी सोउ आधे कँधाही ।
भावते भेष सबै रसखान न जानिए क्यों अँखियाँ ललचाहीं ।
तू कछु जानत या छवि कों यह कौन है साँवरिया वन माहीं ।
मोरत नैन मरोरत भौंह निहोरत सैन अमेंठत बाहीं ॥१६८॥