कान्ह भए बस बाँसुरी

Raskhan

कान्ह भए बस बाँसुरी के अब कौन सखी हमकों चहिहै ।
निस द्यौस रहै संग साथ लगी यह सौतिन तापन क्यों सहिहै ॥
जिन मोहि लिया मनमोहन को रसखानि सदा हमकों दहिहै ।
मिलि आओ सबै सखी भाग चलैं अब तो ब्रज मैं बँसुरी रहिहै ॥७॥