कान परे मृदु वैन

Raskhan

कान परे मृदु वैन मरू करि* मौन रही पल आधिक साधे ।
नंद बवा घर कौं अकुलाय गई दधि लै विरहानल दाधे ।
पाय दुहूननि प्राननि प्रान सों लाज दबें चितवै दृग आधे ।
नैननि ही रसखान सनेह सही किसौ लेउ दही कहि राधे ॥२०३॥