काहू कहूँ सजनी सँग

Raskhan

काहू कहूँ सजनी सँग की रजनी नित बीतै मुकुंद को हेरी ।
आवन रोज कहैं मनभावन आवन की न कबौं करी फेरी ॥
सौतिन भाग बढ़्यौ ब्रज में जिन लूटत हैं निसि रंग घनेरी ।
मो रसखानि लिखी बिधना मन मारिकै आपु बनी हौं अहेरी ॥८॥