काहू को माखन चाखि

Raskhan

काहू को माखन चाखि गयौ अरु काहू को दूध दही ढरकायो ।
काहू को चीर लै रुख चढ़्यौ अरु काहू को गुंजधरा छहरायौ ।
मानै नहीं व्रजें रसखानि सु जानियै राज इन्हें घर आयो ।
आव री बूझें जसोमति सों यह छोहरा जायौ कि मेव* मँगायो ॥१८४॥