काहे कूँ जाति जसोमति
काहे कूँ जाति जसोमति के गृह पोच* भली घर हूँ तो रई* ही ।
मानुष को डसिवौ अपुनो हँसिवौ यह वात उहाँ न नई ही ॥
बैरिनि तौ दृग-कोरनि में रसखान जो बात भई न भई ही ।
माखन सौ मन लै यह क्यों वह माखनचोर के ओर नई ही ॥२२२॥
काहे कूँ जाति जसोमति के गृह पोच* भली घर हूँ तो रई* ही ।
मानुष को डसिवौ अपुनो हँसिवौ यह वात उहाँ न नई ही ॥
बैरिनि तौ दृग-कोरनि में रसखान जो बात भई न भई ही ।
माखन सौ मन लै यह क्यों वह माखनचोर के ओर नई ही ॥२२२॥