काह कहूँ रतियाँ की

Raskhan

काह कहूँ रतियाँ की कथा बतियाँ कहि आवत है न कछू री !
आइ गोपाल लियो भरि अंक कियो मन भायो पियो रस कूँरी ॥
ताही दिना सों गड़ी अँखियाँ रसखानि मेरे अंग में पूरी ।
पैन दिखाई परै अब बावरो* दै के वियोग बिथा की मजूरी ॥११६॥