कुंजगली मैं अली निकसी

Raskhan

कुंजगली मैं अली निकसी तहाँ साँकरे ढोटा कियौ भटभेरो ।
माई री वा मुख की मुसकान गयौ मन बूड़ि फिरै नहिं फेरो ॥
डोरि लियौ दृग चोरि लियौ चित डार्यौ हैं प्रेम को फंद घनेरो ।
कैसी करों अब क्यों निकसों रसखानि पर्यौ तन रूप को घेरो ॥१८२॥