केसरिया पट, केसरि खौर*

Raskhan

केसरिया पट, केसरि खौर* बनौ गर गुंज को हार ठरारो* ।
को हौं जू अपनी या छवि सों जु खरे अँगना प्रति दीठि न डारो ॥
आनि विकाऊ से होड़ रहे रसखानि कहै तुम्ह रोकि दुवारो ।
हूँ तौ विकाऊँ जो लेत वर्न हँस बोल तिहारो है मोल हमारो’ ॥२०४॥