कोई है रास मैं

Raskhan

कोई है रास मैं नैसुक नाचि कै नाच नचाए किए सबको जिन ।
सोई है री रसखानि इहै मनुहारिहूँ सूधैं चितौत न हो छिन ॥
तो मैं धौ कौन मनोहर भाव विलोकि भयो बस हाहा करी तिन ।
औसर ऐसो मिलै न मिलै फिर लंगर मोड़ो कनौड़ो करें किन ॥८५॥