कौन ठगौरी* भरी हरि

Raskhan

कौन ठगौरी* भरी हरि आजु बजाई है बांसुरिया रंग’ भीनी ।
तान सुनी जिनहीं तिनहीं तबहीं’ तिन लाज बिदा कर दीनी ॥
घूमै घड़ी घड़ी’ नन्द के द्वार नवीनी कहा कहुँ वाल प्रवीनी ।
या ब्रजमंडल में रसखानि सु कौन भटू* जो लटू नहिं कीनी ॥९॥