खेलत फाग सुहाग भरी

Raskhan

खेलत फाग सुहाग भरी अनुरागहिं लालन कों धरि कै ।
मारत कुंकुम केसरि के पिचकारिन में रँग कों भरि कै ॥
गेरत लाल गुलाल लली मनमोहिनी मौज मिटा करि कै ।
जात चली रसखानि अली मदमस्त मनौं मन कों हरि कै ॥६॥