खेलै अलीजन* के गन

Raskhan

खेलै अलीजन* के गन मैं उत प्रीतम प्यारे सों नेह नवीनो ।
बैननि बोध करै इत कौं उत सैननि मोहन को मन लीनो ॥
नैननि की चलिवी कछु जानि सखी रसखानि चितैवे कौं कीनो ।
जा लखि पाइ जँभाइ गई चुटकी चटकाइ विदा करि दीनो ॥२०२॥