गोकुल के बिछुरे को
गोकुल के बिछुरे को सखी दुख प्रान ते नेकु गयौ नहीं काढ़्यौ ।
सो फिर कोस हजार तैं आय कै रूप दिखाय दहे पर दाहूँ यौ* ।
सो फिर द्वारिका ओर चले रसखान है सोच यहै जिय गाढ़्यौ ।
कौन उपाय किये करि हैं व्रज में बिरहा कुरुखेत को बाढ़्यौ ॥२२८॥
गोकुल के बिछुरे को सखी दुख प्रान ते नेकु गयौ नहीं काढ़्यौ ।
सो फिर कोस हजार तैं आय कै रूप दिखाय दहे पर दाहूँ यौ* ।
सो फिर द्वारिका ओर चले रसखान है सोच यहै जिय गाढ़्यौ ।
कौन उपाय किये करि हैं व्रज में बिरहा कुरुखेत को बाढ़्यौ ॥२२८॥