गोकुल को ग्वाल काल्हि
गोकुल को ग्वाल काल्हि चौमुँह की ग्वालिन सौं
चाँचर* रचाइ एक धूमहिं मचाइगो ।
हियो हुलसाय रसखानि तान गाइ बाँकी
सहज सुभाइ सब गाँव ललचाइगो ।
पिचका चलाइ और जुवती भिजाइ नेह
लोचन नचाइ मेरे अंगहि बचाइगो ।
सासहिं नचाइ भोरी नन्दहि नचाइ खोरी
बैरिन सचाइ* गोरी मोहि सकुचाइगो ॥१२४॥