ग्वालिन द्वै क भुआन

Raskhan

ग्वालिन द्वै क भुआन गहें रसखानि कौं लाइ जसोमति पाहँ* ।
लूटत हैं कहैं ये वन मैं मन मैं कहैं ये सुख-लूट कहाँ हैं ॥
अँग ही अँग ज्यों ज्यों ही लगें त्यों त्यों ही अँग ही अँग समाहूँ ।
वे पछलें उलटें पग एक ती वै पछलें उलटें पग जाहूँ ॥२०८॥