घर ही घर घेरु
घर ही घर घेरु घना घरिही घरिहाइनि आगें न साँस भरौं ।
लखि मेरियै ओर रिसाहि सबै सतराहि* जौ सौंहें अनेक करौं ।
रसखानि तो काज सबै व्रज तौ मेरो बैरी भयो अब कासों लरों ।
बिनु देखे न क्यों हूँ निमेषै* लगें तेरे लेखें न हूँ या परखें मरौं ॥२३९॥
घर ही घर घेरु घना घरिही घरिहाइनि आगें न साँस भरौं ।
लखि मेरियै ओर रिसाहि सबै सतराहि* जौ सौंहें अनेक करौं ।
रसखानि तो काज सबै व्रज तौ मेरो बैरी भयो अब कासों लरों ।
बिनु देखे न क्यों हूँ निमेषै* लगें तेरे लेखें न हूँ या परखें मरौं ॥२३९॥