चंद सों आनन मैन-मनोहर

Raskhan

चंद सों आनन मैन-मनोहर वैन मनोहर मोहत हौं मन ।
बंक विलोकति लोट भई रसखानि हियो हित दाहत हौं तन ॥
मैं तव तैं कुलकानि* की मैंड़ नखी जु सखी अव डोलत हौं वन ।
वेनु बजावत आवत है नित मेरी गली व्रजराज को मोहन ॥१८५॥