छीर जो चाहत चीर
छीर जो चाहत चीर गहूँ ए जू लेहु न केतक छीर अचैहौ ।
चाखन के मिस माखन माँगत खाहु न माखन केतिक खैहौ ॥
जानत हौं जिय की रसखानि सु काहे को एतिक घात बढ़ैहौ ।
गोरस के मिस* जो रस चाहत सो रस कान्ह जू नेकु न पैहौ ॥८७॥
छीर जो चाहत चीर गहूँ ए जू लेहु न केतक छीर अचैहौ ।
चाखन के मिस माखन माँगत खाहु न माखन केतिक खैहौ ॥
जानत हौं जिय की रसखानि सु काहे को एतिक घात बढ़ैहौ ।
गोरस के मिस* जो रस चाहत सो रस कान्ह जू नेकु न पैहौ ॥८७॥