जग कान्ह भये बस
जग कान्ह भये बस वाँसुरी के अब कौन सखी हमको चहिहै ।
यह राति दिना सँग लागी रहै वा सौति की सासत* को सहिहै ॥
जिन मोहि लियो मन मोहन को रसखान सु क्यों न हमें दहिहै* ।
मिलि आओ सबै कहि भागि चलैं अब तो व्रज में बँसुरी रहिहै ॥१३९॥
जग कान्ह भये बस वाँसुरी के अब कौन सखी हमको चहिहै ।
यह राति दिना सँग लागी रहै वा सौति की सासत* को सहिहै ॥
जिन मोहि लियो मन मोहन को रसखान सु क्यों न हमें दहिहै* ।
मिलि आओ सबै कहि भागि चलैं अब तो व्रज में बँसुरी रहिहै ॥१३९॥