जाको लसै मुख चन्द

Raskhan

जाको लसै मुख चन्द समान कमानी सी भौंह गुमान* हरै ।
दीरघ नैन सरोजहूँ तैं मृग खंजन मीन की पाँत दरै* ॥
रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधि न जाहि टरै ।
जिहि नीके नवै कटि हार के भार सों तासों कहै सव काम करै ॥२१८॥