जानै कहा हम मूढ़

Raskhan

जानै कहा हम मूढ़ सबै समुझी न तबै जबहीं बनि आई ।
सोचत हैं मन ही मन मैं अब कीजै कहा बतियाँ जगवाई ॥
नीचो भयो ब्रज को सब सीस मलीन भई रसखानि दुहाई ।
चेरी को चेटक देखहु री हरि चेरो कियौं धौं कहा पढ़ि माई ॥९७॥