जाहु न कोऊ सखी
जाहु न कोऊ सखी जमुना जल रोकै खड़ो मग नन्द को लाला ।
नैन नचाइ चलाइ चितै रसखानि चलावत प्रेम को भाला ॥
मै जु गई हुती बैरन बाहिर मेरी करी गति टूटि गो माला ।
होरी भई कै हरी भए लाल कै लाल गुलाल पगी ब्रजबाला ॥१२३॥
जाहु न कोऊ सखी जमुना जल रोकै खड़ो मग नन्द को लाला ।
नैन नचाइ चलाइ चितै रसखानि चलावत प्रेम को भाला ॥
मै जु गई हुती बैरन बाहिर मेरी करी गति टूटि गो माला ।
होरी भई कै हरी भए लाल कै लाल गुलाल पगी ब्रजबाला ॥१२३॥