जा दिन तैं निरख्यो
जा दिन तैं निरख्यो नन्दनन्दन कानि तजी घर बन्धन छूट्यौ ।
चारु बिलोकनि की निसि मार सम्हार गई मन मार ने लूट्यौ ॥
सागर को सरिता जिमि धावत रोकि रहे कुल को पुल टूट्यौ ।
मत्त भयो मन संग फिरै रसखानि सरूप सुधारस घूट्यौ ॥२४॥
जा दिन तैं निरख्यो नन्दनन्दन कानि तजी घर बन्धन छूट्यौ ।
चारु बिलोकनि की निसि मार सम्हार गई मन मार ने लूट्यौ ॥
सागर को सरिता जिमि धावत रोकि रहे कुल को पुल टूट्यौ ।
मत्त भयो मन संग फिरै रसखानि सरूप सुधारस घूट्यौ ॥२४॥