डोरि लियौ मन मोरि
डोरि लियौ मन मोरि लियौ चित जोरि लियौ हित तोरि कै तानन ।
कुंजनि तें निकर्यौ सजनी मुसकाइ कह्यौ वह सुन्दर आनन* ॥
हौं रसखानि भई रसमत्त सखी सुनि के कल वाँसुरी कानन ।
मत्त भई वह वीथिन डोलति मानति काहू की नेकु न आनन* ॥१८६॥
डोरि लियौ मन मोरि लियौ चित जोरि लियौ हित तोरि कै तानन ।
कुंजनि तें निकर्यौ सजनी मुसकाइ कह्यौ वह सुन्दर आनन* ॥
हौं रसखानि भई रसमत्त सखी सुनि के कल वाँसुरी कानन ।
मत्त भई वह वीथिन डोलति मानति काहू की नेकु न आनन* ॥१८६॥