ता' जसुदा कह्यौ धेनु
ता’ जसुदा कह्यौ धेनु की ओट ढिंढोरत ताहि फिरें हरि भूलें ।
ढूँढ़न कूँ पग चारि चलैं मचलैं रज माँहि विथुरि दुकूलें ॥
हेरि हँसे रसखान तबै उर भाल तैं टारि के वार लटूलें ।
सो छवि देखि अनन्दन नन्दजू अंगन अंग समात न फूलें ॥१६०॥
ता’ जसुदा कह्यौ धेनु की ओट ढिंढोरत ताहि फिरें हरि भूलें ।
ढूँढ़न कूँ पग चारि चलैं मचलैं रज माँहि विथुरि दुकूलें ॥
हेरि हँसे रसखान तबै उर भाल तैं टारि के वार लटूलें ।
सो छवि देखि अनन्दन नन्दजू अंगन अंग समात न फूलें ॥१६०॥