तीरथ भीर में भूलि

Raskhan

तीरथ भीर में भूलि परी अली छूट गई नेकु धाय* की बाँही ।
हौं भटकी भटकी निकसी सु कुटुम्ब जसोमति की जिहि घाँही* ॥
देखत ही रसखान मनौ सु लग्यौ ही रह्यौ कव कों हियराँही ।
भाँति अनेकन भूली हुती उहि द्यौस की भूलनि भूलत नाँही ॥१६७॥